नालंदा अपने ऐतिहासिक स्थलों के लिए दुनियाभर में जाना जाता है. नालंदा जिला मुख्यालय बिहारशरीफ से 15 किमी दूर पावापुरी एक छोटा सा ऐतिहासिक कस्बा है, यहां 527 ईसा पूर्व में 72 वर्ष की आयु में कार्तिक महीने के कृष्णपक्ष अमावस्या तिथि को भगवान महावीर स्वामी का निर्वाण हुआ था. भगवान महावीर जैन धर्म में 24 वें और अंतिम व चरम तीर्थंकर थे, जिनका जन्म 599 ईसा पूर्व में हुआ था. उनके पिता का नाम राजा सिद्धार्थ और माता का नाम रानी त्रिशला था. उन्होंने 30 वर्ष की आयु में राजपाट और सांसारिक सुख त्याग दिए थे और कड़ी तपस्या से ज्ञान हासिल किया. उन्होंने अपने मतावलंबियों को सत्य, अहिंसा और अपरिग्रह यानी सांसारिक वस्तुओं और धन से मोह न रखने का संदेश दिया था. उन्होंने पावापुरी में अपनी अंतिम देशना दी और वहीं उनको निर्वाण की प्राप्ति भी हुई थी. उस समय से जैन श्रद्धालुओं के लिए यह भूमि पवित्रतम मानी जाती है. इसका प्राचीन नाम अपापापुरी था यानी पापों से मुक्त भूमि. यहां भगवान महावीर की अंतिम देशना भूमि पर प्रसिद्ध समवशरण मंदिर, निर्वाण भूमि पर श्वेतांबर मंदिर और अंतिम संस्कार भूमि पर यहां अद्भुत स्थापत्य से पूर्ण जलमंदिर मौजूद हैं. जलमंदिर 84 बीघे के कमल सरोवर के मध्य स्थित है, जो बहुत ही मनमोहक लगता है. इसके अतिरिक्त दिगंबर मंदिर, जूना समवशरण, दादाबाड़ी मंदिर और नया मंदिर भी अपनी विशिष्टता से श्रद्धालुओं का ध्यान आकर्षित करता है. यहां दुनियाभर के जैन श्रद्धालु दर्शन व पूजन को आते हैं. जैन शास्त्रों के अनुसार यहां के मंदिरों का निर्माण भगवान महावीर के भाई नंदीवर्धन के द्वारा कराया गया था, जिसे बाद में समय-समय पर जैन धर्मावलंबियों ने बनवाया है. इन मंदिरों में आस्था से न केवल पावापुरी एक बड़े तीर्थ स्थल बल्कि पर्यटन स्थल के रूप में भी स्थापित हुआ है.
कई विदेशी यात्रियों ने किया है पावापुरी का उल्लेख
पावापुरी का उल्लेख भारत यात्रा पर आए फ्रांसिस बुकानन, मेजर किट्टो से लेकर जोसेफ डेविड बेगलर ने भी किया है. 1811-12 में पावापुरी पहुंचने वाले मशहूर ट्रैवलर फ्रांसिस बुकानन, 1847 ई़ में यहां आर्कियोलॉजिस्ट कैप्टन किट्टो और 1872-73 में आने वाले जोसेफ डेविड बेगलर ने पावापुरी की दिलचस्प जानकारियां दी है. यह जानना बेहद दिलचस्प है कि बुकानन को पावापुरी के प्रसिद्ध जल मंदिर तक जाने वाली सड़क काफी अच्छी मिली थी और जलमंदिर तालाब का पानी भी काफी साफ मिला था. उन्हें उसी समय तालाब के चारों तरफ ईंट प्लास्टर का घेरा बना हुआ दिखा था. जब 1847 ई़. में जब कैप्टन किट्टो पहुंचे तो उन्हें महसूस हुआ कि पावापुरी एक बड़े शहर जैसा रहा होगा. वर्तमान गांव में सरावक या जैन रहते हैं, जो यह दावा करते हैं कि यह उनके पंथ से जुड़ा हुआ स्थान है. वहीं जब तीस साल बाद 1872 ई. में पुरातत्वविद जेडी बेगलर पहुंचे तो उन्होंने देखा कि गांव का मंदिर एक प्राचीन मंदिर के पास बना हुआ जान पड़ता है. मंदिर बनकर तैयार नहीं हुआ था, लेकिन इसे जल्द ही पूरा होना था. बेगलर ने कहा कि यहां की मूर्तियां प्राचीन हो सकती हैं. उन्होंने जोर देकर कहा कि यहां निश्चित रूप से कुछ प्राचीन मूर्तियां हैं, और मैंने गांव में मंदिर में जो मूर्तियां देखी वह थोड़े भग्न हैं यानी टूटे फूटे हैं और फलस्वरूप इनकी पूजा नहीं की जाती थी. इन तीर्थयात्रियों द्वारा दर्ज तथ्य आज भी यहां देखे जा सकते हैं.
बावन कोठरी तिरपन द्वार और मुर्शिदाबाद धर्मशाला
जैनियों की तीर्थस्थली होने के कारण पावापुरी में कई प्राचीन धर्मशालाएं है. यहां का नाहर धर्मशाला बहुत प्रसिद्ध है, जिसे हम बावन कोठरी तिरेपन द्वार के नाम से भी जानते हैं. अजीमगंज, मुर्शिदाबाद के सेठ नाहर बहादुर की पत्नी गुलाब कुमारी ने उनकी स्मृति में इसकी आधारशिला 1910 में रखी थी. 110 साल पुरानी यह इमारत आज भी अपनी भव्यता बयाँ करती है. यूनाइटेड बंगाल की निशानी मुर्शिदाबाद धर्मशाला भी यहां की भव्यता बयां करती है. जब बिहार बंगाल प्रोविंस का हिस्सा था तभी पावापुरी में करीब 150 साल पहले इस धर्मशाला का निर्माण हुआ था. इन दोनों धर्मशाला की प्राचीनता के कारण यह भी पर्यटन स्थल सरीखा हो गया है. यहां भगवान महावीर के मंदिरों के अतिरिक्त एक प्राचीन देवी दुर्गा मंदिर व सूर्य मंदिर भी है, जहां की मूर्तियां विशिष्ट मानी जाती है. ये सभी मंदिर पालकालीन है. जिसमें इलाके के लोगों की काफी श्रद्धा देखी जाती है. सूर्य मंदिर में विष्णु व सूर्य व नारायण की एक सम्मिलित मूर्ति भी यहां मौजूद है. जहां छठ के अवसर पर विशेष पूजा होती है, यह मूर्ति प्रेमियों के लिए शोध और अध्ययन का केंद्र है. यहां पूजा के उपरांत छठ व्रतियों के द्वारा जलमंदिर छठ घाट पर अर्घ्य दिया जाता है.
राजस्थान में भी बनाया गया है पावापुरी धाम
पावापुरी में आस्था के कारण राजस्थान में भी पावापुरी ती्र्थ धाम बनाया गया है. माउंट आबू की पहाड़ियों के बीच सिरोही जिला मुख्यालय से 22 किमी की दूरी पर सिरोही-मंडार- राजमार्ग पर 1000 बीघा में विशाल पावापुरी धाम का निर्माण कराया गया है, जहां 90 हजार वर्ग फीेट एरिया में पावापुरी के मंदिरों की प्रतिकृति बनाई गयी है, जहां भी पश्चिम भारत से बड़ी संख्या में जैन श्रद्धालु पहुंचते हैं. मालगांव के मूल निवासी केपी संघवी परिवार ने पावापुरी की याद को हमेशा कायम रखने के लिए पावापुरी तीर्थधाम बनाया है. जैन समाज द्वारा नववर्ष दिवाली को ही मनाया जाता है. जैनियों के चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी आज ही जन्म मरण के बंधनों से मुक्त हुए थे, वह समय उत्सव का था, इसलिए तब घी के दीये जलाये गये और उत्सव मनाया गया. पावापुरी का जल मंदिर उनकी अग्नि संस्कार भूमि पर ही निर्मित है, दिवाली के दिन देश और दुनिया के प्रमुख हिस्से से जैन भाई बहन यहां पधारते हैं और प्रभु के निर्वाणोत्सव में शामिल होते हैं. इस मंदिर में महावीर और उनके दो शिष्यों गौतम और सुधर्मा स्वामी की पवित्र चरण पादुका है. इस अवसर पर यहां एक बड़ा मेला लगता है और कला-संस्कृति विभाग बिहार सरकार के द्वारा पावापुरी महोत्सव मनाया जाता है, जिसमें देश के ख्यातिलब्ध कलाकार भाग लेते हैं.
यहां बनता है सवा मन का निर्वाण लड्डू, 16 रुपये मन घी की बोली
भगवान महावीर के जन्म और मरण के बंधनों से मुक्त होने के इस पवित्र प्रसंग को जैन धर्म में सर्वोच्च कल्याणक दिवस माना जाता है, जिसकी याद में हर साल दीपावली की रात जैन श्रद्धालुओं द्वारा निर्वाण लड्डू चढ़ाकर महावीर निर्वाण महोत्सव मनाया जाता है. भगवान महावीर को जैन श्रद्धालुओं के द्वारा निर्वाणोत्सव पर शुद्ध घी का सवा किलो से सवा मन तक का लड्डू चढ़ाया जाता है. इसके बाद जैन नववर्ष उत्सव शुरू हो जाता है. इसके साथ ही भगवान महावीर की मां त्रिशला के चौदह सपनों के प्रति श्रद्धा निवेदित की जाती है. जैन शास्त्रों के अनुसार, भगवान महावीर स्वामी के गर्भ में आने पर उनकी माता रानी त्रिशला ने श्वेतांबर परंपरा में 14 शुभ स्वप्न देखे थे। इन महान सपनों का अर्थ उनके पुत्र के तीर्थंकर या चक्रवर्ती सम्राट बनने और संसार को ज्ञान प्रदान करने से था. यहां के मंदिरों में एक प्राचीन परंपरा का निर्वहन अभी तक होता है. उस समय जब पावापुरी में 16 रुपये प्रति मन की दर से घी की बिक्री होती थी. वह दौर पाल वंश के राजा हस्तिपाल के शासनकाल का था, भगवान महावीर के मंदिरों में उसी दर से घी की खरीदारी होती थी. तब 40 पैसे प्रति किलो की दर से बिकने वाला घी अब भले 1500 रु प्रति किलो तक हो गया है लेकिन यह परंपरा अभी भी निभाई जा रही है. दिवाली में देश भर के जैन श्रद्धालु यहां मंगल आरती और पूजा के लिए घी की बोली लगाते हैं.
मेडिकल कॉलेज बनने से आयी समृद्धि
मेडिकल टूरिज्म के लिए भी पावापुरी जाना जाता है, जहां बिहार ही नहीं बल्कि झारखंड के कई जिलों से लोग इलाज के लिए पहुंचते हैं. पावापुरी मेडिकल कॉलेज की स्थापना तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार द्वारा की गयी थी. 2011 में इसका शिलान्यास किया गया था और 20 अगस्त 2015 को यहां ओपीडी भवन का शुभारंभ किया था. 52.51 एकड़ जमीन पर 562 करोड़ रुपये की लागत से बनाए गए इस मेडिकल कॉलेज अस्पताल में एमबीबीएस की 120 सीटें हैं और इसकी ओपीडी और आईपीडी की कुल बेड क्षमता 500 है. पूर्णत: वातानुकूलित इस अस्पताल को अपनी बेहतर संरचना और स्वास्थ्य सुविधाओं के कारण यहां आर्थिक तरक्की भी आयी है, जहां आसपास के कई गांव-कस्बों में पलायन में कमी आयी है और सब यहां विभिन्न कार्यों में सम्मिलित होकर आत्मनिर्भर हुए हैं.






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