बिहारी तहजीब की पहचान है मगही पान

भारतीय खानपान की परंपरा में पान मुखशुद्धि हेतु एक बेहद प्रसिद्ध खाद्य पदार्थ है। हिंदी के शब्द 'पान' पत्ते के लिए प्रयुक्त संस्कृत के शब्द 'पर्ण' से लिया गया है। संस्कृत में एक और प्रसिद्ध शब्द 'ताम्बूल' है जो न केवल पत्ते बल्कि पान के लिए भी प्रयोग में आता है। पान के लिए एक अन्य संस्कृत शब्द 'वीदा' है, जो आम प्रचलन में 'बीड़ा' है। पान आतिथ्य सत्कार के एक शुभ प्रतीक के साथ हमारी आराधना परंपरा में भी महत्वपूर्ण स्थान है। सनातन परंपरा में ऐसा माना जाता था कि देवी लक्ष्मी पान के पत्ते के अगले भाग में, ज्येष्ठा पीछे, वाणी के देवता दाईं ओर, पार्वती बाईं ओर, विष्णु अंदर, चंद्रमा बाहर, शिव सभी किनारों पर और कामदेव सर्वत्र निवास करते हैं; मृत्यु के देवता यम डंठल में निवास करते हैं, इसलिए पत्ते का उपयोग करने से पहले डंठल को हमेशा तोड़कर फेंक दिया जाता है। पान की इसी महत्ता के कारण इसका पूजा पद्धति में विविध रूप में प्रयोग होता है। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में पान के कई प्रयोग देखे जाते हैं। बिहार के मगध इलाके में पान की एक विशिष्ट किस्म है, जो बेहद मुलायम और स्वादिष्ट होती है, जिसे इस इलाके के नाम पर मगही पान की संज्ञा दी गयी है। पटना, नालंदा, नवादा और औरंगाबाद इलाके में पान की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है। इस क्षेत्र में खेती के बेहद प्राचीन प्रमाण मिलते हैं। चौथी शताब्दी ई.पू. में लिखी गयी जातक कथाओं के कई प्रसंगों में यह दिखाया गया है कि उस समय समाज के विभिन्न वर्गों जिनमें राजा व आम नागरिक के साथ बौद्ध भिक्षु के बीच भोजन के बाद या स्वागत-सत्कार के रूप में पान और सुपारी का सेवन एक सामान्य शिष्टाचार बन चुका था। दूत जातक, साम जातक और विधुरपंडित जातक नामक इन बौद्ध कहानियों में पान को मुख शुद्धि (माउथ फ्रेशनर) और विलासिता या मनोरंजन के साधन के रूप में वर्णित किया गया है। बौद्ध भिक्षुओं को दोपहर बाद मुख शुद्धि, कफ दूर करने और औषधीय रूप में पान (ताम्बूल) चबाने की अनुमति दी गई थी। कई जातक प्रसंगों में, भिक्षु गृहस्थों के घर से मिलने वाले दान में पान के पत्ते और सुपारी स्वीकार करते थे। इन सभी प्रसंगों से यह स्पष्ट हो जाता है कि ईसा पूर्व चौथी शताब्दी तक आते-आते पान भारतीय उपमहाद्वीप में केवल एक वनस्पति नहीं, बल्कि सामाजिक स्वागत-सत्कार का एक अनिवार्य माध्यम बन चुका था। जातक कथाओं के अलावा, उत्तर-वैदिक काल के कुछ धर्मसूत्रों में भी इसके प्रारंभिक संकेत मिलते हैं। इसके बाद के कालखंड में चरक संहिता, सुश्रुत संहिता (75 ई. - 300 ई.) और कौटिल्य के अर्थशास्त्र में इसके औषधीय और व्यावहारिक उपयोग का अधिक व्यवस्थित विवरण मिलता है। पांचवीं शताब्दी ई. के आसपास यानी गुप्तकाल में भी महाकवि कालिदास लिखित रघुवंश महाकाव्य के चौथे सर्ग (रघु के दिग्विजय प्रसंग) में पान यानी ताम्बूल का स्पष्ट जिक्र आया है। राजा रघु की दिग्विजय यात्रा के दौरान जब उनके सैनिक विजय प्राप्त करते हुए दक्षिण भारत की ओर बढ़ते हैं, तो एक प्रसंग में ताम्बूल (पान) के पत्तों से सुसज्जित भूमि या 'पानभूमि' का वर्णन किया गया है। वहां योद्धाओं ने ताम्बूल यानी पान के पत्ते को विजय के बाद उत्सव मनाने की तरह प्रयोग किया है। योद्धाओं द्वारा विजय उत्सव मनाने का सुंदर चित्रण करते हुए कालिदास ने लिखा है: ताम्बूलीनां दलैस्तत्र रचितापानभूमयः। नारिकेलासवं योधाः शात्रवं च पपुर्यशः॥ यानी राजा रघु के योद्धाओं ने ताम्बूल (पान) के पत्तों को चारों ओर बिछाकर अपनी विश्राम गोष्ठी हेतु 'आपानभूमि' का स्थान तैयार की और वहां बैठकर उन्होंने नारियल का आसव पिया तथा शत्रुओं को पूरी तरह पराजित कर अपनी कीर्ति गाथा का यशगान किया।
जब मिला जीआई टैग तो मिली अलहदा पहचान मगध इलाके में सदियों से मिलने वाले पान की इस विशिष्ट किस्म को 28 मार्च 2018 को भारत सरकार के जियोग्राफिकल इंडिकेशन रजिस्ट्री, चेन्नई द्वारा आधिकारिक तौर पर जीआई टैग (पंजीकरण संख्या 554) प्रदान किया गया था। मगही पान के विशिष्ट नाम और गुणवत्ता का अधिकार केवल बिहार के चार जिलों नवादा, नालंदा, गया और औरंगाबाद में पारंपरिक 'बरेजा' पद्धति से उपजाए जाने वाले पान को ही प्राप्त है। पान की खेती के लिए बरेजा का निर्माण किया जाता है। कृषि विभाग, बिहार के अनुसार बरेजा आम तौर पर 100 वर्गमीटर या 200 वर्गमीटर के क्षेत्र में बनाकर किसान द्वारा तैयार किए जाते हैं। बिहार सरकार पान की खेती को बढ़ावा देने और किसानों की आय में वृद्धि करने के लिए बरेजा के निर्माण और पान की खेती में किसानों की मदद करती है। इसके लिए प्रत्येक किसान को क्षेत्र सत्यापन के आधार पर पान विकास योजना के तहत न्यूनतम 11,750 रुपये और अधिकतम 35,250 रुपये की सहायता राशि का प्रावधान किया गया है। इसमें पान के विभिन्न प्रकार और गुणवत्तायुक्त बीज की उपलब्धता के साथ-साथ उत्पादन, भंडारण, और विपणन की उचित व्यवस्था की गयी है, ताकि पान उत्पादक किसानों को अधिकतम लाभ मिल सके। कृषि विभाग ने वित्तीय वर्ष 2024-25 से 2025-26 के लिए पान विकास योजना के तहत 42.50 हेक्टेयर में पान की खेती के विस्तार के लिए 5 करोड़ रुपये स्वीकृत किए हैं।
पाकिस्तान-बांग्लादेश से लेकर मध्य-पूर्व व खाड़ी देशों में मगही पान के कद्रदान मगही पान के उत्पादक रंजीत चौरसिया ने बताया कि मगही पान के कद्रदान देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी रहे हैं। यहां से पाकिस्तान-बांग्लादेश से लेकर मध्य-पूर्व व खाड़ी क्षेत्र के इस्लामिक देशों में पान का निर्यात होता रहा है। हालिया वर्षों में पाकिस्तान व गत वर्ष से बांग्लादेश के साथ सियासी रिश्तों में आई उठापटक के कारण मगही पान का निर्यात इन दो देशों में पूरी तरह ठप पड़ गया है, जबकि वहां से सर्वाधिक मांग होती थी। उन्होंने कहा कि जीआई टैग मिलने के बाद मगही पान उत्पादकों को मखाना, लीची, कतरनी और जर्दालू आम उत्पादकों की तुलना में लाभ अपेक्षाकृत कम हुआ है। उन्होंने बताया कि पर्याप्त संख्या में मंडी की कमी के कारण परेशानी होती है। पूर्व से गयाजी में मंडी है, लेकिन व्यवस्थागत खामियों के कारण परेशानी होती है। बनारस की मंडी में भी बिचौलियों से जूझना पड़ता है। इधर कुछ नए उद्यमियों ने अपने स्तर से नवादा के नारदीगंज और इस्लामपुर के खुदागंज में मंडी का निर्माण किया है। लेकिन यह प्रयास नाकाफी हैं, सरकार को इसके औषधीय गुणों का व्यापक प्रचार-प्रसार करना होगा, इसके साथ ही मंडी और भंडारण की सुविधा के साथ बाजार की सुगमता उपलब्ध करानी होगी और सबसे बढ़कर निर्यात पर ज्यादा जोर देना होगा।
औषधीय गुणों की खान है मगही पान मगही पान उत्पादक कल्याण समिति के सचिव रंजीत चौरसिया के अनुसार आधिकारिक दस्तावेजों में मगही पान को इसकी बिना रेशे वाली कोमलता (कम रेशेदार), चमकदार गहरे हरे रंग, विशिष्ट सुगंध और मुंह में डालते ही घुल जाने वाले अनूठे स्वाद के लिए 'उच्च श्रेणी' का कृषि उत्पाद है, जिसे जीआई टैग प्रदान किया गया था। चौरसिया कहते हैं कि इसके विशिष्ट औषधीय गुण हैं, जिनके बारे में बेहतर प्रचार-प्रसार आवश्यक है। मसलन पान पाचन क्रिया में सहायक होता है, यह लार के स्राव को बढ़ाता है, लार में मौजूद एंजाइम भोजन को जल्दी पचाने में मदद करते हैं। पान चबाने पर यह पेट की मांसपेशियों को आराम देता है। इससे एसिडिटी, गैस और कब्जियत जैसी समस्याओं से राहत मिलती है। वह कहते हैं कि यदि कोई सुपारी के साथ नहीं खाना चाहते हैं, तो भी इसको केवल चबा सकते हैं, मगही पान को चबाने पर यह मुंह के बैक्टीरिया को नष्ट करता है। यह सांसों की दुर्गंध को दूर करता है और मसूड़ों की सूजन को कम करता है। इसको सादे पानी में उबालकर पीने से घुटनों की बीमारी से तो ताजे पत्तों को पीसकर माथे पर लगाने से सिरदर्द और भारीपन में तुरंत आराम मिलता है। \

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